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बाहर आई जेब की पर्ची: पूर्व CM भूपेश बघेल का सवाल – झीरम के मुख्य षड्यंत्रकारियों और अफसरों पर कार्रवाई कब?

6 hours ago
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रायपुर। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने झीरम घाटी नरसंहार मामले में एनआईए (NIA) कोर्ट के फैसले को पूरी तरह आधा-अधूरा करार देते हुए तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कह रहे थे कि मेरी जेब में पर्ची है… तो सुनिए, इस पर्ची में सवाल लिखे हैं कि आखिर झीरम कांड के असली मास्टरमाइंड और उस समय के प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? भूपेश बघेल ने कहा कि असली जरूरत इस बात की है कि सरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री, उस समय के आला अफसरों और घटना स्थल पर मौजूद रहे सरेंडर नक्सलियों को एक साथ बैठाकर पूछताछ करने की हिम्मत दिखाए।

बघेल ने कहा कि घटना के पीछे कथित षड्यंत्र, प्रशासनिक चूक और नक्सलियों-अधिकारियों-नेताओं के बीच संभावित गठजोड़ की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया है कि एनआईए ने जिन पहलुओं की जांच की, उनमें षड्यंत्र की जांच हुई या नहीं? उन्होंने पूछा कि एफआईआर में जिन नक्सली नेताओं के नाम थे, उन्हें बाद में क्यों हटाया गया?

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि झीरम घाटी में कांग्रेस के कई बड़े नेता मौजूद थे। नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा समेत कई नेताओं की हत्या हुई। उनके मुताबिक हमले में बड़ी संख्या में नक्सली शामिल थे, लेकिन सजा सिर्फ 10 लोगों को हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि एनआईए ने केवल 10 लोगों को ही आरोपी क्यों बनाया और कथित बड़े नक्सली नेताओं का क्या हुआ?

मास्टरमाइंड कौन था?

भूपेश बघेल ने कहा कि जब भी कोई बड़ा नक्सली नेता पकड़ा जाता था या मारा जाता था तब सरकार उसे मास्टरमाइंड बताती थी। ऐसे में झीरम हमले का मास्टरमाइंड कौन था, यह अब तक सामने क्यों नहीं आया? उन्होंने देवा और गुड्सा जैसे कथित नक्सली नेताओं का जिक्र करते हुए पूछा कि घटना के समय ये लोग कहां थे और उनसे पूछताछ क्यों नहीं हुई? बघेल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के उस कथित बयान का भी हवाला दिया, जिसमें झीरम घटना को बड़ी चूक बताया गया था। उन्होंने सवाल किया कि एनआईए की जांच में इस प्रशासनिक चूक के लिए किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी बनाया गया या नहीं? उन्होंने पूछा, क्या एक भी कांस्टेबल को सजा मिली? क्या किसी पुलिस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई?

बघेल ने कहा कि यदि प्रशासनिक स्तर पर हुई गड़बड़ियों की जांच नहीं हुई तो जांच को पारदर्शी और पूर्ण कैसे माना जा सकता है। भूपेश बघेल ने कहा कि जब रायपुर के मेफेयर में आयोजित मध्य क्षेत्र परिषद की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सामने उन्होंने जांच वापस मांगी थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट से भी आदेश मिल गया था कि इस मामले में दूसरी एफआईआर दर्ज कर स्वतंत्र जांच की जा सकती है, तब भी साय सरकार ने षड्यंत्र की जांच के लिए कमेटी का गठन क्यों नहीं किया? उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार द्वारा गठित एसआईटी की जांच को भाजपा सरकार ने जानबूझकर रोक दिया।

उन्होंने कहा कि यदि साजिश की जांच होती तो घटनास्थल पर तैनात थानेदार से लेकर डीएसपी, आईजी, डीजी, मुख्य सचिव और तत्कालीन मुख्यमंत्री तक से पूछताछ की जा सकती थी। बघेल ने कहा कि उस समय सरकार के सामने सरेंडर कर चुके ऐसे नक्सली भी थे, जिनके बारे में दावा किया गया कि वे घटना स्थल और हमले की जानकारी रखते थे। उन्होंने कहा कि इन सभी को एक साथ बैठाकर पूछताछ की जाए तो घटना की कई परतें सामने आ सकती हैं।

रमन सरकार द्वारा गठित प्रशांत मिश्रा जांच आयोग पर सवाल उठाते हुए बघेल ने कहा कि आयोग ने खुद उनसे जांच अधूरी बताते हुए समय मांगा था, लेकिन 8 दिन बाद ही अधूरी रिपोर्ट सरकार के बजाय सीधे राज्यपाल को सौंप दी गई। इसके बाद जब उनकी सरकार ने दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का पुनर्गठन किया, तो भाजपा के लोग उसके खिलाफ हाईकोर्ट चले गए। भूपेश बघेल ने साफ कहा कि अगर सरकार सच सामने लाना चाहती है, तो तत्कालीन नेतृत्व से पूछताछ करे, सरेंडर नक्सलियों और अधिकारियों को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ किया जाए और रोकी गई एसआईटी जांच को बहाल किया जाए। बघेल ने तंज कसते हुए कहा कि मुख्यमंत्री साय एक विद्वान व्यक्ति हैं, लेकिन उनसे इस तरह राजनीतिक संरक्षण देकर जांच दबाने की उम्मीद प्रदेश को नहीं थी।

सीएम साय ने बघेल से कहा – झीरम के सबूत थे तो क्यों नहीं दिए?

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने झीरम घाटी नरसंहार मामले में NIA के फैसले को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि NIA की जांच और कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सत्ता के दौरान उनके नेता झीरम कांड से जुड़े सबूत अपनी जेब में होने की बात कहते थे। अगर उनके पास मामले से जुड़े कोई ठोस सबूत थे, तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने रखना चाहिए था। अब कोर्ट का फैसला आ चुका है, इसलिए उस पर सवाल उठाने के बजाय कांग्रेस को फैसले का स्वागत करना चाहिए। कोर्ट ने 100 से अधिक गवाहों की गवाही सुनने के बाद मामले में दोषियों को लेकर फैसला सुनाया है।

कोई सबूत है तो एनआईए को सौंपे कांग्रेस : विजय शर्मा

झीरम घाटी मामले में एनआईए के फैसले को आधा अधूरा बताने पर डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि हिडमा को अपना आदर्श बताने वाली कांग्रेस के मुंह से इस मामले पर टिप्पणी शोभा नहीं देती। विजय शर्मा ने कहा कि झीरम हमले में एनआईए की जांच सही नहीं होती तो क्या कोर्ट सजा दे पाती। 25 मई 2013 को झीरम घाटी नक्सली हमला हुआ, 27 मई 2013 को मामले की जांच एनआईए को सौंपी गई। उस दौरान केंद्र में यूपीए की सरकार थी। साल 2014 के बाद से ही इस मामले में गिरफ्तारियां हुई। कांग्रेस ने कोई ट्रायल नहीं कराया। अब एनआईए के पीछे लगकर फैसला हुआ है। डिप्टी सीएम ने कहा कि अभी सिर्फ एक सजा हुई है और चीजें बाकी है। उन्होंने कहा कि एनआईए की जांच जारी है और जिसके पास भी कोई सबूत है तो उसे जांच एजेंसी के सामने पेश करना चाहिए।

जानिए क्या है पूरा मामला

दरअसल, 2013 में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने थे। रमन सिंह मुख्यमंत्री थे। 10 साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जीत के लिए जोर लगा रही थी। पार्टी पूरे राज्य में परिवर्तन यात्रा चला रही थी। 25 मई को सुकमा में परिवर्तन रैली की गई। रैली के बाद कांग्रेस नेताओं का काफिला सुकमा से जगदलपुर जा रहा था। इसमें करीब 25 गाड़ियां थीं। इन गाड़ियों में 200 नेता-कार्यकर्ता थे।

सबसे आगे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा थे। उनके पीछे महेंद्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ी थी। उनके पीछे बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार चल रहे थे। यानी छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पूरी टॉप लीडरशिप इस काफिले में थी। दोपहर करीब 3:40 बजे काफिला झीरम घाटी में पहुंचा। यहीं नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता बंद कर दिया। गाड़ियां रुकते ही 200 से ज्यादा नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। हमले में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की मौके पर ही मौत हो गई। करीब डेढ़ घंटे तक फायरिंग होती रही।

शाम करीब 5:30 बजे नक्सली पहाड़ों से उतरकर नीचे आए और एक-एक गाड़ी चेक की। एक गाड़ी में उन्हें सलवा जुडूम आंदोलन शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा मिल गए। आंदोलन की वजह से नक्सली महेंद्र कर्मा को दुश्मन समझते थे। उन्होंने बेरहमी से महेंद्र कर्मा की हत्या कर दी। उन्हें करीब 100 गोलियां मारी गईं। चश्मदीदों के मुताबिक, नक्सलियों ने कुछ नेताओं को नाम लेकर पहचाना और उन्हें गोली मारी। हमला पूरी योजना के साथ किया गया। खुफिया एजेंसियों को हमले की कोई भनक नहीं थी।

13 साल बाद NIA कोर्ट ने सुनाया फैसला

झीरम घाटी नक्सली हमला मामले में 5 सितंबर शनिवार को जगदलपुर स्थित NIA की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया। इस केस में 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चली थी। एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है, जबकि बाकी 10 आरोपियों पर फैसला आया है। कोर्ट ने झीरम कांड मामले में सभी 10 आरोपियों को सभी धाराओं में दोषी माना है। 27 लोगों की हत्या और 15 लोगों की हत्या का प्रयास के तहत सभी आरोपियों को दोषी सिद्ध पाया गया। आरोपियों को 16 सितंबर को दंड सुनाया जाएगा।

ये आरोपी पाए गए दोषी

1) प्रमिला मोडियम
2) चैतू लेकाम उर्फ ​​मुन्ना
3) सुमित्रा उर्फ ​​सुमित्रा पुनेम मोडियम
4) मुक्का मांडवी
5) कोसा कवासी उर्फ ​​कोसाराम
6) आयता मरकाम
7) मदकामी देवा
8) जोगा मदकामी
9) बनजामी सन्ना उर्फ ​​चमरू उर्फ ​​डेंगा
10) महादेव नाग

कुल 11 के खिलाफ मामला दर्ज था, जिसमें से एक की मृत्यु हो चुकी है।

 

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