• breaking
  • Chhattisgarh
  • नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत का बयान

नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत का बयान

1 hour ago
36


रायपुर, 16 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ विधानसभा नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि, संसद में पारित एमएमडीआर संशोधन विधेयक केवल एक कानून नहीं है, बल्कि यह देश के खनिज-समृद्ध राज्यों के संवैधानिक अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला है। यह विधेयक बताता है कि मोदी सरकार की प्राथमिकता देश के गरीब राज्य नहीं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट घराने हैं।

डॉ. महंत ने कहा कि, सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि राज्यों को खनिजयुक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार है। इसी फैसले के आधार पर ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए वर्ष 2005 से लंबित हजारों-हजार करोड़ रुपये की वसूली का रास्ता खुला था। यह फैसला उन राज्यों के लिए आर्थिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक अवसर था, जिनकी धरती से देश की सबसे बड़ी औद्योगिक संपत्ति निकाली जाती है, लेकिन जिनकी जनता आज भी गरीबी, विस्थापन और पिछड़ेपन का बोझ ढो रही है।

डॉ. महंत ने कहा कि, अब मोदी सरकार ने संसद में यह संशोधन लाकर सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले की भावना को ही निष्प्रभावी करने का प्रयास किया है। सरकार चाहे जो कानूनी व्याख्या दे, लेकिन पूरे देश में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे राज्यों के वैध दावों और लंबित वसूली पर गंभीर असर पड़ेगा। यदि ऐसा होता है, तो यह सीधे-सीधे खनिज राज्यों के अधिकारों का हनन होगा।

मोदी सरकार ने गरीब राज्यों का हक छीनकर अमीर कॉरपोरेट घरानों की थाली सजाने का काम किया है।

डॉ. महंत ने कहा कि, यह देश का दुर्भाग्य है कि जिन राज्यों की धरती खोद-खोदकर अरबों-खरबों रुपये की संपत्ति निकाली जाती है, उन्हीं राज्यों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। दिल्ली में बैठे लोग उद्योगपतियों के मुनाफे की चिंता कर रहे हैं, लेकिन खदानों की धूल, प्रदूषण, विस्थापन और जंगलों के विनाश का बोझ उठाने वाले राज्यों और वहां के लोगों की कोई चिंता नहीं है।

छत्तीसगढ़ की जनता जानना चाहती है कि इस संशोधन से हमारे राज्य को कितना नुकसान होगा?

डॉ. महंत ने कहा कि, यदि ओडिशा में एक लाख करोड़ रुपये तक के संभावित नुकसान की चर्चा हो रही है, तो छत्तीसगढ़ सरकार बताए कि हमारे राज्य का संभावित वित्तीय नुकसान कितना हो सकता है? क्या यह 30 हजार करोड़ होगा? 40 हजार करोड़ होगा? 50 हजार करोड़ होगा? सरकार ने इसका कोई अध्ययन कराया है या नहीं?

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि—

  • सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद छत्तीसगढ़ को संभावित रूप से कितनी राशि मिलने की उम्मीद थी?
  • इस संशोधन के बाद उस राशि पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
  • क्या छत्तीसगढ़ सरकार ने इस विधेयक का संसद में या केंद्र सरकार के सामने विरोध किया?
  • क्या भाजपा के सांसदों ने छत्तीसगढ़ के हित में एक भी आवाज उठाई?

यदि नहीं, तो वे छत्तीसगढ़ की जनता को जवाब दें कि उन्होंने किसका पक्ष लिया—छत्तीसगढ़ का या कॉरपोरेट घरानों का?

आज छत्तीसगढ़ का खनिज केवल लौह अयस्क, कोयला और बॉक्साइट नहीं है। यह हमारे आदिवासियों का भविष्य है, हमारे युवाओं के रोजगार का आधार है, हमारे स्कूलों, अस्पतालों, सिंचाई परियोजनाओं और सड़कों के लिए राजस्व का स्रोत है।

जिस पैसे से बस्तर, सरगुजा, कोरबा, रायगढ़ और कबीरधाम जैसे जिलों का विकास होना चाहिए था, यदि वही पैसा बड़े उद्योगपतियों की बैलेंस शीट में चला जाए, तो यह केवल आर्थिक फैसला नहीं होगा, बल्कि सामाजिक अन्याय भी होगा।

मैं एक और गंभीर सवाल उठाना चाहता हूं।

आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्यों को उसका लाभ मिलने से पहले ही संसद के माध्यम से कानून बदल दिया गया? किसके दबाव में यह संशोधन लाया गया? किसके हितों की रक्षा के लिए यह पूरी कवायद की गई? देश जानना चाहता है कि इस कानून का सबसे बड़ा लाभार्थी कौन है।

डॉ. महंत ने कहा कि, आज पूरे देश में यह धारणा बन रही है कि मोदी सरकार का हर बड़ा आर्थिक फैसला अंततः कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में जाकर खड़ा हो जाता है। यह संशोधन भी उसी आशंका को और मजबूत करता है। यदि सरकार के पास इसका कोई ईमानदार जवाब है, तो वह देश और विशेषकर खनिज-समृद्ध राज्यों की जनता के सामने रखे।

मैं छत्तीसगढ़ सरकार से मांग करता हूं कि वह तत्काल एक श्वेतपत्र जारी करे और बताए कि इस संशोधन से राज्य के राजस्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यदि इससे एक रुपया भी छत्तीसगढ़ का नुकसान होता है, तो भाजपा सरकार को जनता को जवाब देना होगा कि उसने अपने ही राज्य के हितों की रक्षा क्यों नहीं की।

नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि, छत्तीसगढ़ की खदानें कॉरपोरेट मुनाफे की खान नहीं हैं। वे यहां की जनता की साझा संपत्ति हैं। उस संपत्ति पर पहला अधिकार छत्तीसगढ़ की जनता का है, किसी कॉरपोरेट बोर्डरूम का नहीं।

गरीब राज्यों का हक छीनकर अमीरों की थाली सजाना न आर्थिक नीति है, न संघवाद: यह केवल अन्याय है।

Social Share

Advertisement