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नए सत्र से बिलासपुर के 10 से अधिक विधि महाविद्यालयों में बदलेगा पढ़ाई का स्वरूप, फॉरेंसिक साइंस अनिवार्य

8 hours ago
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बिलासपुर। विधि शिक्षा अब केवल कानून की धाराओं और न्यायिक व्याख्याओं तक सीमित नहीं रहेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भारतीय न्याय संहिता के अनुरूप देशभर के विश्वविद्यालयों और विधि महाविद्यालयों को फारेंसिक आधारित अध्ययन को पाठ्यक्रम में शामिल करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद नए शैक्षणिक सत्र से बिलासपुर के 10 से अधिक विधि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी पढ़ाई का स्वरूप बदलता नजर आएगा। छात्रों को अब अदालतों में उपयोग होने वाले वैज्ञानिक साक्ष्यों, डिजिटल फारेंसिक और अपराध जांच की बुनियादी जानकारी भी दी जाएगी, जिससे वे आधुनिक न्याय व्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप तैयार हो सकें।

यूजीसी की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता के तहत न्याय वितरण प्रणाली में फारेंसिक विज्ञान की भूमिका तेजी से बढ़ी है। इसी को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों सहित सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को फारेंसिक आधारित अध्ययन, केस स्टडी और शोध कार्य को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए कहा गया है।

बिलासपुर में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के विधि विभाग, कौशलेंद्र राव विधि महाविद्यालय समेत अनेक निजी और शासकीय संस्थानों में हर वर्ष बड़ी संख्या में छात्र एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई करते हैं। नए बदलाव के बाद इन छात्रों को केवल कानूनी प्रावधान ही नहीं, बल्कि डीएनए जांच, फिंगरप्रिंट, डिजिटल साक्ष्य, साइबर अपराध जांच और अपराध स्थल प्रबंधन जैसे विषयों की भी जानकारी दी जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि नए आपराधिक कानूनों में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे में भविष्य के वकीलों, न्यायिक अधिकारियों और विधि विशेषज्ञों के लिए फॉरेंसिक की बुनियादी समझ आवश्यक होगी। इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक तथ्यपरक, तकनीकी और प्रभावी बन सकेगी। साथ ही विद्यार्थियों के लिए साइबर लॉ, क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन, कॉरपोरेट जांच और डिजिटल एविडेंस विशेषज्ञता जैसे नए करियर विकल्प भी खुलेंगे। शिक्षा जगत इसे विधि शिक्षा के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहा है।

क्या है फारेंसिक साइंस

फारेंसिक साइंस वह विज्ञान है जिसके माध्यम से अपराध से जुड़े साक्ष्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। इसमें डीएनए परीक्षण, फिंगरप्रिंट जांच, दस्तावेज सत्यापन, डिजिटल डाटा विश्लेषण और अपराध स्थल की जांच शामिल होती है। अदालतों में इन साक्ष्यों का उपयोग अपराध सिद्ध करने या निर्दोषता साबित करने के लिए किया जाता है। नई व्यवस्था में विधि छात्रों को इन प्रक्रियाओं की बुनियादी समझ दी जाएगी।

क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव

देश में लागू नए आपराधिक कानूनों ने वैज्ञानिक साक्ष्यों को न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। कई गंभीर अपराधों में फारेंसिक जांच को अनिवार्य महत्व दिया गया है। ऐसे में केवल कानून की धाराओं का ज्ञान पर्याप्त नहीं माना जा रहा। वकीलों, अभियोजकों और न्यायिक अधिकारियों को वैज्ञानिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता और प्रक्रिया की जानकारी होना आवश्यक है। इसी आवश्यकता को देखते हुए यूजीसी ने यह पहल की है।

छात्रों को क्या मिलेगा लाभ

नई व्यवस्था के बाद विद्यार्थियों को पारंपरिक वकालत के अलावा कई नए क्षेत्रों में अवसर मिलेंगे। साइबर क्राइम जांच, डिजिटल फॉरेंसिक, कॉरपोरेट लीगल ऑडिट, वित्तीय अपराध जांच और तकनीकी साक्ष्य विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित की जा सकेगी। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और छात्र बदलती न्यायिक व्यवस्था की मांग के अनुरूप अधिक दक्ष और प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।

बिलासपुर के संस्थानों पर असर

बिलासपुर में संचालित विधि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और अध्ययन सामग्री में बदलाव करना होगा। शिक्षकों को भी नए विषयों की समझ विकसित करनी होगी। फारेंसिक और साइबर जांच से जुड़े विशेषज्ञों के व्याख्यान, कार्यशालाएं और केस स्टडी आधारित शिक्षण को बढ़ावा मिलने की संभावना है। इससे शहर के विधि छात्रों को राष्ट्रीय स्तर के आधुनिक पाठ्यक्रम का लाभ मिल सकेगा।

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