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क्या ‘कर्मवीर’ पाट पाएंगे सत्ता और संगठन की खाई? छत्तीसगढ़ भाजपा में बड़े बदलाव का विश्लेषण

12 hours ago
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रायपुर। भारतीय जनता पार्टी ने छत्तीसगढ़ में एक बड़ा और बहुप्रतीक्षित संगठनात्मक फेरबदल करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि आलाकमान राज्य की आंतरिक राजनीतिक गतिशीलता पर पैनी नजर रखे हुए हैं। एक दशक से अधिक समय तक संगठन की धुरी रहे प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय को झारखंड और क्षेत्रीय प्रभारी अजय जामवाल को मुंबई भेजना महज एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इन दोनों दिग्गजों की जगह अब कर्मवीर को प्रदेश के नए संगठन मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह बदलाव एक ओर जहां पार्टी की राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर यह छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर चल रही खींचतान को दुरुस्त करने का एक सख्त कदम भी है।

पवन साय का कार्यकाल छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए ऐतिहासिक और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। एक दशक से भी लंबे समय तक संगठन मंत्री के रूप में उन्होंने कई चुनाव देखे, रणनीतियां बुनीं और कार्यकर्ताओं का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया। उनके तबादले की सुगबुगाहट राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से थी, लेकिन इस बदलाव के पीछे जो सबसे ठोस कारण उभर कर सामने आ रहा है, वह है सत्ता और संगठन के बीच पनपती गहरी खाई।

हाल के समय में यह चर्चा आम हो चली थी कि छत्तीसगढ़ में सत्ता और संगठन के बीच तालमेल का अभाव है। सत्ता और संगठन के बीच संवादहीनता या वर्चस्व की अदृश्य लड़ाई चल रही है। शीर्ष नेतृत्व ने शायद इसी खतरे को भांपते हुए इस बड़े बदलाव को हरी झंडी दी है।

अजय जामवाल और पवन साय को क्रमशः मुंबई और झारखंड भेजकर भाजपा ने यह संदेश भी दिया है कि वह अपने अनुभवी रणनीतिकारों का उपयोग उन राज्यों में करना चाहती है, जहां पार्टी को उनके लंबे संगठनात्मक अनुभव की दरकार है। अब सारा दारोमदार नए संगठन मंत्री कर्मवीर के कंधों पर होगा। उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती उस खाई को पाटने की होगी, जिसकी वजह से यह पूरा फेरबदल हुआ है। कर्मवीर को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार और संगठन एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करें, न कि प्रतिस्पर्धी बनकर। कार्यकर्ताओं की बात सरकार तक पहुंचे और सरकार की योजनाएं संगठन के जरिए आम जनता तक, इसके लिए एक मजबूत सेतु का निर्माण करना उनका प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए।

कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ भाजपा में हुआ यह फेरबदल केवल चेहरों का बदलाव नहीं है, बल्कि पार्टी की कार्यप्रणाली को पटरी पर लाने और आंतरिक कलह को खत्म करने का एक स्पष्ट संदेश है। अब देखना यह है कि नया संगठनात्मक ढांचा सत्ता और संगठन के बीच वह जरूरी सामंजस्य स्थापित कर पाता है या नहीं, जिसकी उम्मीद में यह पूरी कवायद की गई है।

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