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हाईकोर्ट ने निरस्त किया सहायक प्राध्यापक का निलंबन, आदेश को माना अवैध, जानिए पूरा मामला…

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में कमलेश दुबे ने अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी के माध्यम से एक याचिका प्रस्तुत की, जिसमें न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए शासकीय बृजलाल वर्मा महाविद्यालय पलारी में राजनीति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक के निलंबन आदेश को अवैध माना और दुर्भावनापूर्ण करार देते हुए उसे रद्द कर दिया। न्यायालय ने इस निलंबन को “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन” मानते हुए टिप्पणी की कि यह कार्यवाही न केवल सेवा नियमों के विरुद्ध थी, बल्कि समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली भी थी।
याचिकाकर्ता की ओर से प्रकरण की पैरवी अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने की। उन्होंने दलील दी कि यह पूरा घटनाक्रम पूर्व नियोजित और दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होता है। न तो किसी छात्रा ने पूर्व में कोई शिकायत की थी और न ही प्रीति साहू ने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसी कोई बात उठाई थी। उन्होंने कहा कि अखबार में छपी खबर को आधार बनाकर व्यक्ति की छवि खराब करना और उसके आधार पर निलंबन जैसी सख्त कार्यवाही करना पूरी तरह अनुचित और असंवैधानिक है।
राज्य शासन की ओर से यह तर्क दिया गया कि छात्राओं की शिकायतों के मद्देनजर यह निलंबन आवश्यक था, लेकिन अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि सिर्फ शिकायतों या समाचार पत्र में प्रकाशित खबरों के आधार पर कोई कर्मचारी निलंबित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके विरुद्ध उचित जांच, प्रमाण और सुनवाई न हो। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यद्यपि निलंबन एक दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, लेकिन यह व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति पर गहरा असर डालता है। जब यह कार्रवाई बिना उचित आधार, सुनवाई के अवसर और दृष्टिगोचर द्वेषपूर्ण मंशा के तहत की जाए तो यह न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत हो जाती है।
अंततः, न्यायालय ने निलंबन आदेश (दिनांक 23.09.2015) को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि चूंकि याचिकाकर्ता पहले से ही अंतरिम आदेश के अंतर्गत सेवा में वापस आ चुके हैं।